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Showing posts from April, 2019

आप जिन के क़रीब होते हैं नूह नारवी

आप जिन के क़रीब होते हैं  वो बड़े ख़ुश-नसीब होते हैं  जब तबीअ'त किसी पर आती है  मौत के दिन क़रीब होते हैं  मुझ से मिलना फिर आप का मिलना  आप किस को नसीब होते हैं  ज़ुल्म सह कर जो उफ़ नहीं करते  उन के दिल भी अजीब होते हैं  इश्क़ में और कुछ नहीं मिलता  सैकड़ों ग़म नसीब होते हैं  'नूह' की क़द्र कोई क्या जाने  कहीं ऐसे अदीब होते हैं 

असर उस को ज़रा नहीं होता मोमिन ख़ाँ मोमिन

असर उस को ज़रा नहीं होता रंज राहत-फ़ज़ा नहीं होता बेवफ़ा कहने की शिकायत है तो भी वादा-वफ़ा नहीं होता ज़िक्र-ए-अग़्यार से हुआ मालूम हर्फ़-ए-नासेह बुरा नहीं होता किस को है ज़ौक़-ए-तल्ख़-कामी लेक जंग बिन कुछ मज़ा नहीं होता तुम हमारे किसी तरह न हुए वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता उस ने क्या जाने क्या किया ले कर दिल किसी काम का नहीं होता इम्तिहाँ कीजिए मिरा जब तक शौक़ ज़ोर-आज़मा नहीं होता एक दुश्मन कि चर्ख़ है न रहे तुझ से ये ऐ दुआ नहीं होता आह तूल-ए-अमल है रोज़-फ़ुज़ूँ गरचे इक मुद्दआ नहीं होता तुम मिरे पास होते हो गोया जब कोई दूसरा नहीं होता
MiTa de apni hasti ko agar kuchh martaba chahe Ki dana khak mein mil kar gul-o-gulzaar hota hai

अपनी धुन में रहता हूँ नासिर काज़मी

अपनी धुन में रहता हूँ मैं भी तेरे जैसा हूँ ओ पिछली रुत के साथी अब के बरस मैं तन्हा हूँ तेरी गली में सारा दिन दुख के कंकर चुनता हूँ मुझ से आँख मिलाए कौन मैं तेरा आईना हूँ मेरा दिया जलाए कौन मैं तिरा ख़ाली कमरा हूँ तेरे सिवा मुझे पहने कौन मैं तिरे तन का कपड़ा हूँ तू जीवन की भरी गली मैं जंगल का रस्ता हूँ आती रुत मुझे रोएगी जाती रुत का झोंका हूँ अपनी लहर है अपना रोग दरिया हूँ और प्यासा हूँ