Saghar Siddiqui Ghazal: अगर बज़्म-ए-हस्ती में औरत न होती
अगर बज़्म-ए-हस्ती में औरत न होती
ख़यालों की रंगीन जन्नत न होती
सितारों के दिलकश फ़साने न होते
बहारों की नाज़ुक हक़ीक़त न होती
जबीनों पे नूर-ए-मसर्रत न खिलता
निगाहों में शान-ए-मुरव्वत न होती
घटाओं की आमद को सावन तरसते
फ़ज़ाओं में बहकी बग़ावत न होती
फ़क़ीरों को इरफ़ान-ए-हस्ती न मिलता
अता ज़ाहिदों को इबादत न होती
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